मेरा गांव और प्रकृति की अनमोल छटा
- Deep Tiwari

- Aug 22, 2016
- 1 min read
Updated: May 15, 2022
सावन के महीने ने अपने बड़े भाई भादौ को इस प्रकृति को संवारने की जिम्मेदारी दे दी है। भादौ का महीना, आसमान से बरसती बूंदे और हर तरफ खूबसूरत प्रकृतिक समदरता से लबरेज लबालब नजारे, यह देख कर भी हम लोग महामारी के कारण मन मसोसकर रह जाते हैं। ऐसे समय में जब बड़े पर्यटन स्थलों पर नहीं जा सकते हैं, ऐसे समय में अपने घुमक्कड़ी मन की प्यास बुझाने के लिए अपने आसपास की जगहों पर चले जाता हूं। मैंने अपने आसपास की कुछ जगहों को चिन्हित किया है। उन्हीं में से एक और जगह पर पिछले दिनों मेरा जाना हुआ, वही के नजारे आप सभी के लिए प्रस्तुत हैं।
यह स्थान झांसी- खजुराहो नेशनल हाइवे पर स्थित एक छोटे से कस्बे आलीपुरा से तकरीबन 05 किलोमीटर दूर है। सधन जंगलों के बीच बसे एक छोटे से गांव जोरन के बीच छत्रशाल कालीन यह पुरानी इमारत को देखने से ही एहसास हो जाता है कि इस भव्य इमारत का इतिहास और वास्तुकला क्या रही होगी।
मुगलिया और बुंदेली वास्तुकला से निर्मित इस इमारत का हर एक भाग अध्यन करने वाला है। चूना पत्थर,उरद की दाल और शंख को पीस कर इस इमारत का निर्मा ण किया गया है।आज भी अंदर के कमरों में भव्य भित्ती चित्र और साफ हवा के प्रवाह के लिए बने झरोखे इस बात की पुष्टि करते हैं कि हजारों साल पहले वास्तुकला किन ऊंचाईयों पर थी। प्राकृतिक सौंदर्य से संपन्न इस जगह का बारिश के मौसम में आनंद कुछ और ही रहता है।



















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